Tuesday, 5 July 2016

 वाणी प्रकाशन की विशिष्ट प्रस्तुति 

भारतीय भाषाओं में रामकथा 

कन्नड़, बांग्ला, पहाड़ी, अवधी, राजस्थानी, गुजराती  


 पुस्तक के सन्दर्भ में 
‘‘भारतीय संस्कृति के विभाजन को केन्द्र में रखते हुए भारतीय भाषाओं एवं राज्यों को पृथक्-पृथक् खंडों में बाँटने वाले विदेशी राजतन्त्रों के कारण भारत बराबर टूटते हुए भीअपने सांस्कृतिक सन्दर्भों के कारणअब भी एक सूत्रा में बँधा है। एकता के सूत्र में बाँधने वाले सन्दर्भों में रामकृष्णशिव आदि के सन्दर्भ अक्षय हैं। भारतीय संस्कृति अपने आदिकाल से ही राममयी लोकमयता की पारस्परिक उदारता से जुड़ी सम्पूर्ण देशउसके विविध प्रदेशों एवं उनकी लोक व्यवहार की भाषाओं में लोकाचरण एवं सम्बद्ध क्रियाकलापों से अनिवार्यतः हजारों-हजारों वर्षों से एकमेव रही है। सम्पूर्ण भारत तथा उसकी समन्वयी चेतना से पूर्णतः जुड़ी इस भारतीय अस्मिता को पुनः भारतीयों के सामने रखना और इसका बोध कराना कि पश्चिमी सभ्यता के विविध रूपों से आक्रान्त हम भारतीय अपनी अस्मिता से अपने को पुन: अलंकृत करें। भारतीय भाषाओं में रामकथा को जन-जन तक पहुँचाने का यह हमारा विनम्र प्रयास है।’’


भारतीय भाषाओं में रामकथा : कन्नड़  भाषा 


कन्नड़ में रामकथा की भरमार का मुख्य कारण यह रहा है कि कन्नड़ प्रदेश विभिन्न धार्मिक सन्तों की कर्मभूमि रही है। रामानुजाचार्यमध्वाचार्य एवं शंकराचार्य आदि ने यहाँ अपने मतों का खूब प्रचार किया और विशेष रूप में आचार्य मध्वाचार्य एवं वैष्णव मत का खूब प्रचार-प्रसार यहाँ रहा है। इसलिए रामकथा को लोगों की अधिक स्वीकृति मिल गयी और राम पूर्ण रूप से यहाँ लोकजीवन और लोकमानस में घुल-मिल और समा गये हैं।


भारतीय भाषाओं में रामकथा : बांग्ला भाषा 

बंगाल में रामकथा के बारे में बात आरम्भ की जाय तो अच्छा होगा कि रवीन्द्रनाथ के कथन से ही कहना शुरू हो। लोक साहित्य’ पुस्तक के ग्राम्य साहित्य’ प्रकरण में रवीन्द्रनाथ अपनी बात प्रस्तुत करते हैं बंगला ग्राम्य गान में हर-गौरी एवं राधा-कृष्ण की कथा के अलावा सीता-राम एवं राम-रावण की कथा भी पायी जाती है किन्तु तुलना की दृष्टि से अल्प है।...बंगाल की मिट्टी में उस रामायण की कथा हर-गौरी और राधा-कृष्ण की कथा के  ऊपर सिर नहीं उठा पायीवह हमारे प्रदेश का दुर्भाग्य है। जिसने राम को युद्ध-क्षेत्र में एवं कर्म-क्षेत्र में देवता का आदर्श माना हैउसके पौरुषकर्तव्यनिष्ठा एवं धर्मपरकता का आदर्श हमारी अपेक्षा उच्चतर है।
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भारतीय भाषाओं में रामकथा : पहाड़ी  भाषा 

पहाड़ी भाषा में रामकथा का अति महत्त्व है। आज के परिवर्तनशील युग में मानव आधुनिकता की दौड़ में,चकाचौंध में सुखशान्ति की अपेक्षा रखता हैजो नितान्त असम्भव है। भारतीय संस्कृति के उच्च आदर्श,नैतिकतासामाजिकता का जो निदर्शन रामकथा में लक्षित होता हैउनका थोड़ा-सा भी चिन्तन-मनन करेंतो मानव को एक स्वर्गिक आनन्द की प्राप्ति होगीजिसकी आज के युग में महती आवश्यकता है।


भारतीय भाषाओं में रामकथा : अवधी भाषा 

अवधी भाषा में यद्यपि रामकथा का बड़ा वैविध्य हैफिर भीपरिमाण और स्तर की दृष्टि से सर्वाधिक समृद्ध काव्यधारा है-रामकाव्य की। अद्यावधि अवधी में शताधिक रामकाव्य रचे गये हैं। इस रामकाव्य परम्परा में रामकथा से सम्बन्धित समस्त पात्रों स्थानोंघटनाओं और उनके रचनाकारों का समावेश किया जाना अभीष्ट है। 


भारतीय भाषाओं में रामकथा : राजस्थानी भाषा 

राजस्थानी लोक-समाज और साहित्य-संस्कृति भी रामकथा की दृष्टि से काफी समृद्ध है। हिन्दी समाज तो तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से ही रामकथा से परिचित है इसलिए उसे राजस्थानी रामकाव्यों में वर्णित रामकथा के स्वरूप में कहीं-कहीं भिन्नता भी मिलेगी। घटना-प्रसंग भी वहाँ कुछ अलग रूप में दिखाई देंगे। वस्तुतः राजस्थानी भाषा के रामकाव्यों पर संस्कृत की रामायण परम्परा का भी काफी प्रभाव है। कहीं-कहीं लोक-प्रभाव भी अपने पूरे रूप-रंग के साथ साकार होता है। राजस्थानी भाषा में आधुनिक काल में भी पर्याप्त संख्या में रामकथा सम्बन्धी रचनाओं का सृजन हुआ है। आधुनिक चिन्तन दृष्टि तथा विचारधारा के अनुरूप रामकथा सम्बन्धी विभिन्न पात्रों के चरित्रांकन तथा घटना-प्रसंगों के रूपांकन में वैसा ही परिवर्तन राजस्थानी में भी दिखाई देता है जैसा हिन्दी तथा अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य में। ‘भारतीय भाषाओं में रामकथा’ श्रृंखला की अन्य पुस्तकों की तरह ‘भारतीय भाषाओं में रामकथा : राजस्थानी भाषा’ भी अपने विषय-वस्तु और उसकी प्रस्तुति के कारण संग्रहणीय और बेहद उपयोगी है।    
  

भारतीय भाषाओं में रामकथा : गुजराती भाषा 

गुजराती में रामकथा की साहित्यिक परम्परा के साथ उसकी एक पुष्ट मौखिक परम्परा भी रही है। यह परम्परा जहाँ जनसाधारण और आदिवासी समाज के बीच परम्परा प्रवाह के रूप में प्राप्त होती हैवहीं रामकथा के विद्वान प्रवचनकारों के माध्यम से भी सुलभ है। आधुनिक काल के प्रभावशाली प्रवचनकारों में अहमदाबाद के निकट सोला में भागवत विद्यापीठ के संस्थापक श्री कृष्णशंकर शास्त्रीबड़ौदा के श्री रामचन्द्र केशव डोंगरे महाराजरोहा के श्री पांडुरंग बैजनाथ आठवलेमहुआ के श्री मोरारी बापू और खेड़ा जिला के दंताली आश्रम के स्वामी श्री सच्चिदानन्दजी महाराज उल्लेखनीय हैं। सौभाग्य से इनके प्रवचनों के संकलन भी सम्पादित एवं प्रकाशित रूप में उपलब्ध हैं। अतएव रामकथा में रुचि रखने वाले वर्तमान पाठकों के साथ भविष्य के पाठक भी इनका लाभ उठा सकते हैं।


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